Tuesday, September 2, 2008

लोकसंस्कृति में पर्यावरण संरक्षण-३


कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को दीपवर्तिका का पर्व दीपावली मनाया जाता है । अंग्रेज़ी कैलेण्डर के अनुसार यह पर्व अक्टूबर या नवम्बर महीने में पड़ता है । रामायण काल से ही यह पर्व मनाया जाता रहा है । दीपावली का अर्थ है दीपों की अवलि अर्थात् दीपों की पङ्क्ति । इस पर्व के विषय में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं उनमें से एक कथा भगवान् श्रीराम से जुड़ी हुई है । कहते हैं कि इसी दिन श्रीरामचन्द्र जी चौदह वर्ष का वनवास व्यतीत कर और लंका के राजा रावण पर विजय प्राप्त कर अयोध्या वापस आये थे। इस अवसर पर स्म्पूर्ण अयोध्यावासी प्रसन्नचित्त थे। उनका हृदय प्रमुदित हो रहा था । इस दिन उन्होंने दीपमालिका से पूरी अयोध्या नगरी को दुल्हन सा सजाया था । श्रीराम के स्वागत मे सम्पूर्ण अयोध्यावासियों ने घृत का दीपक जलाया था । तभी से यह दिन प्रतिवर्ष दीपावली के रूप में मानाया जाने लगा ।
यह पर्व “तमसो मा ज्योतिर्गमय” का पर्व भी है अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का पर्व । इस दिन घनघोर काली रात दीपों से जगमगा उठती है । इसे दीवाली भी कहते हैं ।
इस पर्व के विषय में भगवान् श्रीकृष्ण से जुडी एक कथा भी प्रचलित है । कहते हैं कि इसी दिन भगवान् श्रीकृष्ण नें अत्याचार के प्रतीक नरकासुर का वध किया था, जिससे जनता को अपार हर्ष हुआ था तथा उसने घी का दीपक जलाकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की थी ।
इससे जुड़ी एक कथा और प्राप्त होती है कि इसी दिन भगवान् विष्णु ने नरसिंह रूप धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया था । जिससे जनता को बहुत शान्ति और आनन्द मिला था तथा उसने दीप जलाकर खुशियाँ मनायी थी।
कहते हैं कि इसी दिन समुद्रमंथन से लक्ष्मी और धन्वन्तरि जि प्रकट हुए थे इसीलिये इस पर्व पर लक्ष्मी जी की पूजा का विधान है तथा व्यापारी वर्ग का यह प्रमुख पर्व है।
सिख लोग भी इस पर्व को भिन्न रूप में मनाते हैं । इसी दिन सन् १५७७ में अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर की नींव रखी गयी थी । इसके अतिरिक्त सिक्खों के छठे गुरु हरगोविन्द सिंह जी को इसी दिन कारावास से मुक्ति मिली थी । अतः इस दिन सिख लोग भी हर्षोल्लास मनाते हैं ।
जैन लोग भी इस दिन को विशेष रूप में मनाते हैं । इसी दिन जैनियों के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था ।
इसी दिन से हमारे पड़ोसी देश नेपाल का नेपाली संवत् प्रारम्भ होता है ।
यह पर्व अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है । भारत के हर प्रान्त में दीपावली मनानें का कारण भिन्न-भिन्न है परन्तु यह पर्व एकता का पर्व है जो विश्वबन्धुत्व का संदेश देता है । दीपावली के कई दिनों पूर्व से ही इसकी तैयारियाँ होने लगती हैं । लोग नये वस्त्र सिलवाते हैं । अपने घरों की व आसपास की सफाई करते हैं । तथा घरों की पुताई करवाते हैं । कहतें हैं कि इस दिन वर्ष भर में एक बार लक्ष्मी भ्रमण पर आती हैं अतः घर साफ सुथरा होना चाहिए अन्यथा लक्ष्मी लौट जायेंगी । सफाई को सुनिश्चित करने के लिये बनाई गयी यह मान्यता पर्यावरण संरक्षण का ही एक अंग है । इस अवसर पर भिन्न-भिन्न प्रकार की मिठाईयाँ और पकवान कई दिनों पूर्व से बनने लगते हैं । लगभग एक सप्ताह पूरव से ही सर्वत्र आतिशबाजी का माहौल होता है । बच्चे और बड़े सभी इस दिन आतिशबाजी का आनन्द लेते हैं ।
इस दिन शाम को गणेश लक्ष्मी की पूजा होती है । पूजा के बाद सम्पूर्ण घर और तत्संबन्धित स्थानों पर घी और सरसो, रिल के तेल के दीपकों की पंक्ति सजायी जाती है । तथा खूब आतिशबाजी की जाती है जिससे आकाश सजा रहता है ।
इस दिन जुआ खेलने की भी प्रथा है क्योंकि यह लक्ष्मी का पर्व माना जाता है । अतः कुछ स्थानों पर पूजा के बाद जुआ खेलने की भी व्यवस्था होती है । दीपावली के दिन व्यापारी वर्ग दूकानों पर लक्ष्मी की पूजा करता है तथा अपना बही खाता आदि बदलकर नया करता है । इसके पीछे उनकी मान्यता है कि लक्ष्मी धन-धान्य से परिपूर्ण करती हैं । किसानों के लिये भी यह पर्व महत्त्वपूर्ण है । इस समय खरीफ की फसल पककर तैयार हो जाती है तथा उनका घर और खलिहान धान्य से परिपूर्ण होता है ।
कार्तिक अमावस्या को मनाये जाने वाले इस पर्व का विशेष वैज्ञानिक महत्त्व है । प्रत्येक प्रमुख भारतीय पर्व दो ऋतुओं की सन्धिकाल पर मनाया जाता है । कार्तिक अमावस्या भी वर्षा ऋतु और शीत ऋतु का सन्धिकाल है । वर्षा ऋतु में माना जाता है कि कीड़ों-मकोड़ों का प्रजनन सर्वाधिक होता है तथा भारी वर्षा से प्रदूषण बहुत अधिक बढ़ जाता है क्योंकि वस्तुएँ पानी से भीगकर सड़ने लगती हैं। ऎसे समय जब वातावरण के कीट सर्वाधिक होते हैं दीपों का पर्व दीपावली मनाया जाता है । घी और विभिना प्रकार के तेलों में कीटाणु नाशक क्षमता विद्यमान होती है । घी व तेलों का दीपक जलाने से वातावरण में स्थित कीटणुओं (वैक्टीरिया) का नाश हो जाता है फलतः उनसे फैलने वाले रोगों के प्रकोप की सम्भावना कम हो जाती है । लोग इस पर्व के लिये अपने आसपास की सफाई के अतिरिक्त घरों की लिपाई- पुताई भी करते हैं जिससे वहाँ से समस्त गन्दगी समाप्त हो जाती है तथा स्वच्छ वायु प्राप्त होती है । प्राचीनकाल में जब साधन इतने सुलभ नही थे तब यहीब् स्वच्छता बीमारियों से बचने का उपाय हुआ करती थी । आज भी इसकी प्रासंगिकता है परन्तु आज मानव निर्मित प्रदूषण इतना बढ़ गया है जिसका निवारण इस प्रकार के प्राकृतिक साधनों से सम्भव नही है फिर भी व्यक्तिगत स्वच्छता तो इसमें निहित ही है ।
आज विज्ञान के आविष्कारों का प्रभुत्व हम अपने पर्वों त्यौहारों पर भी देख रहे । दीपावली भी इस संदर्भ में अपवाद नही है । आज दीपावली के दीपकों का स्थान मोमबत्तियों और विद्युत बल्बों ने ले लिया है जिनसे पर्यावरण में सुधार के स्थान पर प्रदूषण में ही वृद्धि होती है । य्ह स्थिति निश्चय ही शोचनीय व विचारणीय है ।
कुछ भी हो हमारे इन पर्वों से हमारे पूर्वजों की सामाजिक और प्राकृतिक पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि का पता चलता है ।

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