Thursday, September 11, 2008

आतंकवाद

आज के ही दिन अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर हमला हुआ था ११ सितम्बर २००१ को । उस हमले नें न केवल अमेरिका को वरन् सम्पूर्ण विश्व को दहला दिया था । इस हमले के बाद अमेरिका ने आतंकवादियों के विरुद्ध बिगुल बजाया । कुछ हद तक वह अपने मकसद में कामयाब भी हुआ है । उस समय सम्पूर्ण विश्व आतंकवाद की समस्या को लेकर चिन्तित हुआ था । भारत भी उस समय नींद से कुछ जागा था तथा इसने भी उस हमले पर कुछ टिप्पणियाँ की थीं । पर उसके कुछ दिन बीतते ही जैसी ही वह बात पुरानी हुई भारत की इस समस्या के प्रति चैतन्यता जाती रही । २००१ के बाद से भारत में अनेक आतंकवादी गतविधियाँ दिन-प्रतिदिन तेज़ रफ़्तार के साथ घटित हो रहीं हैं । हर आतंकवादी गतिविधियों में मारे जाने वाले लोगों के परिजनों को सरकार कुछ धनराशि प्रसाद के रूप में बाँटकर मामले को सीबीआई जाँच के लिये दान देकर आराम फ़रमाती रहती है तब तक जब तक आतंकवादी किसी दूसरी घटना को अंजाम नही देते । और जब दूसरी आतंकवादी घटना घटती है तब फिर वही अपना पञ्चम राग अलापने लगते हैं । उसके कुछ दिन बाद जैसे ही उस मामले पर धूल जमती है उनका रग खराब होंने लगता है और वे धीरे-धीरे अपने मुलायम तकिये का सहार लेकर सो जाते हैं । तथा नींद से तब जागते हैं जब जयपुर में विस्फोट होता है या अहमदाबाद में अथवा बिहार व झारखण्ड में नक्सलवादी व माओवादी उग्र होते हैं । आतंकवाद व्यक्तिमात्र से जुड़ी समस्या नही है अपितु यह समस्त राष्ट्र से जुड़ी समस्या है । इससे हमारी सीमाएं ही नही अपियु हमारे भारत का हृदयस्थल राष्ट्रिय राजधानी दिल्ली तक असुरक्षित है , हमारा संसद भव असुरक्षित है । फिर भी हमारे राजनेता ,लोकतन्त्र के पहरेदार इस ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहे । अति और आश्चर्य की सीमा तब पार हो जाती है जब हमें संविधान के चतुर्थ स्तम्भ समाचारपत्रों और मीडिया से पता चलता है कि अमुक नेता का इस आतंकवादी संगठन से सम्बंध है। तब इस देश की जनता को और भी असुरक्षा सताने लगती है । आखिर जहाँ के कर्णधार ही बिक जायें शत्रुओ के हाथ वह देश अपनी एकता, एवं सम्प्रभुता कब तक बनाये रह सकता है । कहावत है कि घर का भेदी लंका ढाये, ये कहावत आज के नेताओं पर चरितार्थ होती है । ऎसी विषम परिस्थिति में जब हमारा देश आन्तरिक और बाह्य दोनों प्रकार के आतंकवाद से जूझ रहा है , आवश्यकता है ऎसे नेताओं केवे जिनकी आँखों में पानी हो , जिन्हे आज़ादी की कीमत पता हो , जिन्हें देश के साथ गद्दारी करते शर्म आये और ग्लानि का अनुभव हो । जो भारतीय पैंसों से स्विटज़रलैण्ड के बैंको को न भरें अपितु उन्हें देश के विकास में लगाये । ऎसे युवा कर्मठ नेता तभी हमारे बीच उत्पन्न हो सकेंगे जब हम अपनी शिक्षा-व्यवस्था में परिवर्तन कर अपनें नौनिहालों को स्वतन्त्रता के मूल्य से परिचित करायेंगे तथा उन्हें भान करायेंगे की परतन्त्रता कैसे होती है । यदि दुर्भाग्यवश हम ऎसा नहीं कर सके तो यह कहना अत्युक्ति न होगी कि वह दिन दूर नही है जब हमें पुनः परतन्त्रता देखनी पड़ सकती है । अतः आवश्यकता है कि वर्तमान में हमारे भावी राजनेताओं का सृजन हो ताकि उनकी स्थिति ऎसी न हो कि-

लाल चेहरा है नही फिर लाल किसके
लाल खून नही अरे कंकाल किसके?
अतः प्रत्येक आतंकवादी घटना को ध्यान में रखते हुए तथा भारत की स्वतन्त्रता और सम्प्रभुता की रक्षा के लिये हमें अपने अतीत में झाँकने की अपिरहार्य आवश्यकता है ताकि पुनः इतिहास न दुहराया जा सके ।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ’दिनकर’ नें स्वतन्त्रता के परिप्रेक्ष्य में जो कुछ लिखा था, आज उसे ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि-

प्रण करना है सहज, कठिन है लेकिन उसे निभाना
सबसे बड़ी बात है प्रण का अन्तिम मूल्य चुकाना।
अन्तिम मूल्य न दिया अगर, तो और मूल्य देना क्या?
करने लगे मोह प्राणों का, तो भी प्रण लेना क्या?
सस्ती कीमत पर बिकती रहती जब तक आज़ादी।
तब तक सभी बनें रह सकते हैं त्यागी बलिदान॥
पर मँहगी में मूल्य तपस्या का देना दुष्कर ह।
हँसकर दे जो प्राण, न मिलता वह मनुष्य घर-घर है ॥

2 comments:

Renu Sharma said...

hi,aapka lekh sarahneey hai .hum chahe aatank ki bat karen ya aajadi ki asurksha ki bat ek hi hai .
desh mai khoon khrawa ho raha hai or raja soye hue hain .
raja ki saja janta bhog rahi hai .
bahut achchha likhte ho .

उमेश कुमार said...

yar main nahi samjjhata ki sara kam sarkar hi kre . aaj tk bharat men itne ngo kaam kare rhe hain lekin unka is or koi rujhan nahi najar aata.