Monday, September 8, 2008

हमारे नौनिहाल और नशा

आज परिवेश इतना विषाक्त हो चुका है कि हमारे नौनिहाल भी नशीले पदार्थों के आदी होते जा रहे हैं । कही न कही इसमें माता-पिता की व्यक्तिगत व्यस्तता तथा आस-पास का वातावरण प्रमुख कारण है । आज देश में नशीले पदार्थॊ का सेवन करने वालों में बच्चों किशोरों की संख्या बहुत अधिक है । चोटे-चोटे गाँवों में स्थान-स्थान पर चाहे दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुएँ न मिलें पर गुटका, तम्बाकू, सिगरेट की दूकानें सहज सुलभ हैं। जब हम रेलगाड़ी से सफ़र करते हैं तो हमें १२-१४ वर्ष के लड़के-लड़कियाँ व वृद्ध-युवा महिलायें गुटखा के पाउचों की मालाये लिये बेचते मिल जाते हैं। कै अभिवावक तो वर्षों तक जान ही नही पाते हैं कि उनका बच्चा नशा करता है । बालक व किशोर अपनी मित्र मण्डली के साथ घर-परिवार के सदस्यों से छिपकर नशा करनें लगते हैं किसी को भनक तक नही होती। परिवार वालों को तब पता चलता है जब वे नशे के कारण किसी बीमारी के ग्रास हो जाते हैं और चिकित्सक के पास ले जाये जाते हैं । आज स्थिति की गम्भीरता का अनुमान मात्र इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्राथमिक पाठशालाओं में पढने वाले बच्चे चुराकर या अपने ज़ेब खर्च से नशीले पदार्थ लेते सहज देखे जा सकते हैं। पान की दूकानों पर हर जगह लिखा होता है की १८ वर्ष से कम आयु वर्ग को पान तम्बाकू बेचना अपराध है। इन नशीले पदार्थों के पैक पर विधिवत् छपा होता है कि यह स्वास्थ्य के प्रति हानिकारक है पर इन चेतावनियों बैनरों पोस्टरों का क्रियान्वयन कितना हो पाता है यह कोई मात्र आधे घण्टे किसी पान की दूकान पर खड़ा होकर देख सकता है । सरकार आज नशा उन्मूलन के लिये, नशा मुक्ति के लिये अनेक नियम बना रही है। इसके लिये करोड़ों रुपये व्यय कर रही है पर परिणाम क्या निकल रहा है वही ढाक के तीन पात। कोई भी सरकार तब तक कोई सुधार नही कर सकती जब तक जनता का सहयोग न प्राप्त हो। यह एक प्रायोगिक तथ्य है । इसी कारण भारत सरकार भी करोड़ों रुपया स्वाहा करने के बाद भी कुछ नही कर पायी ।जब तक माता-पिता इस अपने नौनिहालों की इस प्रवृत्ति के प्रति जागरूक नही होगे उनकी गतिविधियों पर नज़र रखने का उनके पास समय नही होगा तब तक स्वयं सृष्टा भी कुछ नही कर सकता इस सन्दर्भ में सरकार क्या कर सकेगी । आज इससमस्या के प्रति न केवल अभिभावक वर्ग को जागरूक होने की आवश्यकता है अपितु युवा वर्ग का इस सम्दर्भ में जागरूक होना मात्र आवश्यकता नही बल्कि अपरिहार्य आवश्यका है । कहा जाता है कि यदि युवा शक्ति चाहे तो कुछ भी कर सकती है और यह कथन प्रयोगों पर खरा भी उतरा है । अतः युवा शक्ति को इस महामारी से छुटकारा दिलाने और भारत को नशामुक्त देश बनाने के लिये आगे आना होगा। यदि वे इस हेतु आगे आते हैं तो कुछ भी कर सकते हैं । इसी सन्दर्भ में रवीन्द्र शुक्ल जी की पंक्तियाँ हैं:-
युवा सदा इतिहास बनाता
लेखक उसको लिखता है।
बलिदानों का कञ्ज हमेशा
युवा हृदय में खिलता है॥

1 comment:

Renu Sharma said...

hi , mukesh !!
aap achchha likhte ho .
aage bhi koshish karungi aapko padne ki .
shubhkamnayo ke sath.