Friday, August 29, 2008

सङ्गति

सङ्गति का मानव जीवन ही नही अपितु प्राणिमात्र के जीवन में बहुत महत्त्व है । शुक भी यदि वेदपाठी के साथ रहे तो वह वेद पाठ करने लगता है । ऎसे हमारे यहाँ अनेक उदाहरण हैं। सन्त कबीरदास का दोहा है:-
सङ्गति ही गुण होत है सङ्गति ही गुण जाय।
बाँस, फाँस औ मीसरी एकहि साथ बिकाया ॥
अर्थात् सङ्गति का बहुत प्रभाव पडता है। सङ्गति के कारण ही मिसरी के साथ बाँस का भी भाव बढ गया जिसकी वस्तविक कीनत पाई भर भी नही थी । एक कलाकार की संगति से इक रास्ते में ठोकर मारने के कारण अनेक बार पथिकों क कोपभाजन बनने वाला बेडौल प्रस्तर भी सुन्दर मूर्ति का रूप धारण कर लेता है और कलाप्रश्ंशकों के प्रसंशा का पात्र बनता है ।
इसलिये संगति पर ध्यान देना अति आवश्यक है क्योंकि कहा गया है:-
काजल की कोठरी में कैसो हू सयानो जाय ।
एक लीकि काजल की लागि पै है लागि है ।।
अर्थात् काजल से भरे कक्ष में कितना भी बचकर जाओ काजल कहीं न कहीं लग अवश्य जायेगा , क्योंकि उसका ऎसा स्वभाव है ।अब्दुर्रहीम खानखाना की यह उक्ति मात्र महापुरुषों पर खरी उतरती है कि:-
जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नही लिपटे रहत भुजंग ॥
प्रत्येक व्यक्ति महापुरुष नही होता ठीक उसी तरह जैसे प्रत्येक वस्तु चन्दन नही होती । अतः सङ्गति सजगता के साथ करनी चाहिये। एक कार्यक्रम में मुख्यवक्ता ने एक प्रसंग सुनाया था कि एक बार वे किसी घर में गये । दरवाजा खटखताया । थोडी देर में दरवाजा खुला और एक नौजवान हाथ में पट्टी बाँधे बाहर आया । उसकी स्थिति देखकर उन्हे आश्चर्य हुआ कि इतना हट्टा-कट्टा नौजवान हाथ में पट्टी बाँधे है। उन्होंने उससे पूछा कि कुश्ती में चोट लग गयी?तो नौजवान ने कहा नहीं। फिर उन्होंने पूछा कि तो क्या कही किसी वाहन से टक्कर हो गयी या गिर गये ?तो उसने उत्तर दिया नहीं ऎसी कोई बात नहीं है। फिर उन्होंने पूछा तो तुम्हे फिर कैसे चोट लगी ? इसपर उस नौजवान ने बताया कि बाथरूम में नहाने गया था वही गिर गया और हाथ टूट गया ।
उपरोक्त प्रसंग बताने से मेरा अभिप्राय यह है कि कुसंगति से अच्छा से अच्छा व्यक्ति भी नही बच सकता ठीक उसी तरह जैसे बाथरूम में फिसलकर गिरने से किसी हट्टे-कट्टे नौजवान का हाथ टूट सकता है । अतः कुसंगति में न पडना ही बुरी आदतॊं से बचने का एकमात्र विकल्प है ।

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